Aalap and Taan: आलाप और तान किसे कहते हैं? Best Deffination In Hindi

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आलाप और तान किसे कहते हैं, What Is Aalap and Taan In Hindi

What Is Aalap and Taan? Aalap and Taan संगीत के आभूषण हैं, जिनसे संगीत में सौन्दर्यता आती है |
संगीत में Aalap and Taan क्या है, क्यों जरूरी है एवं आलाप और तान का अभ्यास कैसे करें इसे प्रयोग करने की सही विधि क्या है?

What Is Aalap and Taan, आलाप और तान किसे कहते हैं?
What Is Aalap and Taan, आलाप और तान किसे कहते हैं?

Aalap aur Taan Kya hai?, Aalap aur Taan Kise Kahte Hain?

हिन्दुस्तानी क्लासिकल संगीत हो या बॉलीवुड के गाने अथवा भजन, ग़ज़ल या क़व्वाली Aalap and Taan का अपना एक अलग ही स्थान होता | आलाप और तान संगीत के आभूषण हैं जिनसे संगीत में सौन्दर्यता आती है गाने, बंदिश, गजल, भजन, ठुमरी, टप्पा, कव्वाली सभी बिना Aalap and Taan के अधूरे रहते हैं | आलाप और तान कई प्रकार से प्रयोग में लाये जाते हैं

अलाप – ऐसे विलंबित स्वर विस्तार जो अपने रागों के स्वरुप अनुसार लगाये जाते हैं आलाप कहे जाते हैं |आलाप में आवश्यकता अनुसार मींड, मुरकी, खटका, गमक आदि का प्रयोग किया जाता है | आलाप दो तरह से लिया जाता है या तो गीत/ बंदिश से पहले या तो गीत/बंदिश के बीच में | गीत बंदिश के पहले आलाप को हम किसी भी प्रकार से प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन गीत/बंदिश के बीच का आलाप हमें गीत/बंदिश की मात्रा यानी ताल के अनुसार गाना चाहिए | आलाप गाने से गीत/बंदिश की सुन्दरता बढ़ जाती है एवं रागों के स्वरों पर पकड मजबूत होती है | अलाप को दो प्रकार से प्रयोग किया जाता हैं

1. आकर में
2. नोम तोम तनन जैसे शब्दों में

Taan Kise Kahate Hain?, What Is Taan In Hindi

 आलाप और तान में सिर्फ गति का अंतर होता है तान की गति द्रुत(तेज) होती है | तान का प्रयोग सिर्फ गीत/बंदिश के बीच में ताल/मात्रा के अनुसार होता है | रागों में स्वरों को द्रुत लय में  विस्तार करने को तान कहते हैं | तान को प्रयोग करने के कई प्रकार हैं –

1.Sapat Taan –

                 जिस तान में राग के स्वरों को क्रम से प्रयोग किया जाता है उसे सपाट तान कहते हैं | जैसे – राग मालकौंस में – निसा गम धनि सांs सांनि धम गम गसा  |  

2. Shudh Taan –

                    किसी भी राग के आरोह व अवरोह के अनुसार तान बोलने को शुद्ध तान कहते हैं | जैसे – जौनपुरी राग में – सारे मप धनि सांरें सांनि धप मग रेसा |

3. Kut Taan –

                        जिस तान में स्वर क्रमनुसार न होकर टेढ़े – मेढ़े हो उसे कूट तान कहते हैं | जैसे – साग रेम गप रेग  रेम गरे सा |

4. Mishr Taan –

                    शुद्ध और कूट तानो के मिश्रित रूप को मिश्र तान कहते हैं | जैसे – सारे मप धप मप मप मरे मरे सा |

5. Alankaarik Taan –

                            जब कोई तान किसी अलंकार का रूप लेती है तो उसे अलंकारिक तान कहते हैं | जैसे – सरेग रेगम गमप मपध पधनी धनिसां, सानिध निधप धपम पमग मगरे गरेसा |

6. Chhut ki Taan –

                            जब कोई तान झटके के साथ ऊपर से नीचे को आती है अथवा नीचे से ऊपर को जाति है, तो उसे छूट की तान कहते हैं | जैसे – गंs गंरे सांनि धप मग रे सा |

 “इसमें और भी प्रकार होते हैं जैसे –  दानेदार तान, बराबर की तान, गमक की तान, लड़त की तान, फिरत की तान,जबड़े की तान आदि | यदि आप इन सभी प्रकारों की भी व्याख्या चाहते हैं तो जरूर कमेंट करें, मैं इन सभी की व्याख्या भी आप लोगों को देने का जरूर प्रयास करूंगा |” Difination of Aalap and Taan.

Aalap aur Taan ka Abhyas Kaise Karein?

Aalap and Taan का अभ्यास करने के लिए हम जिन रागों पर अभ्यास करने वाले हैं उनके Aalap and Taan को क्रमानुसार पहले लिख लेना चाहिए फिर धीरे – धीरे अभ्यास शुरू करना चाहिए और  फिर तान के लिए धीरे – धीरे शुरुआत करते हुए गति को बढ़ाना चाहिए |

यह हमेशा ध्यान रखें की शुरुआत अपने गुरुजनों के देख – रेख में ही करें और जब आपका स्वर सही तरीके से लगने लगे तो फिर आप स्वतः भी अभ्यास कर सकते हैं, बस इतना ध्यान रहे की बिना गुरुजनों के देख – रेख में किया गया अभ्यास गलत भी हो सकता है, और यह आपके कंठ को बेसुरा भी कर सकता है जिससे आपकी सारी मेहनत ख़राब हो जाएगी और कंठ भी |

अभ्यास के लिए राग बिलावल के कुछ आलाप व तान –

आलाप –
सा – ग – | ग म रे –  | ( 8 मात्रा )
ग प – ध | म ग म रे | ( 8 मात्रा )
ग प – ध | नि ध प – | ध नि सां नि | ध प म ग |(16 मात्रा )

तानें  –
सारे गप धनि सांरें   | सांनि धप मग रेसा | ( 8 मात्रा )
गप धनि सांरें सांनि | धप मग मरे सा- | ( 8 मात्रा )
गप निनि सांसां सां- | सांनि धप मग मरे | गम पग मरे सां-| ( 12 मात्रा )

विशेषवाद्यों में प्रयोग किये जाने वाले तानो को तोड़ा कहते हैं | छोटे ख्याल में ज्यादातर दुगुन और कभी – कभी बराबर के लय की तथा बड़े ख्याल में में चौगुन और आठ गुन के लय की तान बोलते हैं | तान के प्रकारों में अलंकारिक तानो का विशेष महत्व है, ये तानें सुनने में बहुत अच्छी लगती हैं | आलाप के बाद गीत प्रारंभ किया जाता है और इसी स्थान से तबले का प्रयोग भी शुरू होता है |

 “यदि आपको और भी अन्य रागों के Alap and Taan चाहिये तो आप  – हमें जरूर कमेंट करें |”

            अब तक आप आलाप और तान को अच्छे से समझ चुके होंगे | आलाप और तानो की हिन्दुस्तानी क्लासिकल म्यूजिक में क्या महत्व है कैसे प्रयोग करते हैं प्रयोग करने की विधि आदि | मेरी कोशिश रही है कम शब्दों में ज्यादा से ज्यादा बातों को सामने रखा जाय और मुझे उम्मीद है की आपको भी अच्छे से समझ आ गया होगा |

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